जब वोट बटता है तो असर घता है, वोट है मगर आवाज़ नहीं, मुस्लिम समाज की राजनीतिक चुनौती

"राजनीतिक बुनियाद पर मुसलमानों की कमज़ोर नुमाइंदगी वार्ड रचना और वोट बैंक की बिखरी तस्वीर पर उठते सवाल"
जलगांव: 
 देश की सबसे बड़ी अल्पसंख्यक आबादी — मुस्लिम समाज की राजनीतिक भागीदारी और प्रतिनिधित्व से जुड़ा है
भारत का लोकतंत्र संख्याबल पर आधारित है, लेकिन जब ये संख्या एकजुट नहीं होती, तो इसका असर राजनीतिक ताकत पर साफ दिखाई देता है। देश में मुस्लिम आबादी लगभग 15 प्रतिशत से अधिक है, मगर इनकी राजनीतिक नुमाइंदगी अक्सर बेहद कमज़ोर और असंतुलित रही है
विशेषज्ञ मानते हैं कि इसके पीछे दो बड़ी वजहें हैं  वोट बैंक का बिखराव और 'वार्ड रचना' में की गई सियासी चालाकियाँ
वोट बैंक के बिखराव का मतलब है कि मुस्लिम वोट कभी एकजुट होकर इस्तेमाल नहीं होते। नतीजतन, ये वोट राजनीतिक पार्टियों के लिए तो फ़ायदेमंद होते हैं, लेकिन मुस्लिम समाज के लिए इसका कोई ठोस राजनीतिक प्रतिफल सामने नहीं आता
 अब बात करते हैं ‘वार्ड रचना’ की यानी डिलिमिटेशन की यह प्रक्रिया तकनीकी लगती है, लेकिन जानकारों का कहना है कि ये एक ख़ामोश राजनीतिक साज़िश बन चुकी है। मुस्लिम बहुल इलाक़ों को जानबूझकर इस तरह बाँटा जाता है कि उनका वोट प्रभावहीन हो जाए
 वरिष्ठ शिक्षाविद और पूर्व प्राचार्य अकील खान बियावली का मानना है कि मुस्लिम समाज को अब सिर्फ़ संख्या पर नहीं, बल्कि संगठन, रणनीति और ज़मीनी मेहनत पर ध्यान देना होगा
हर वार्ड की सही सीमा निर्धारण, वोटर लिस्ट की जांच, प्रत्याशी चयन और मतदान की रणनीति — ये सभी ऐसे ठोस कदम हैं जिनसे मुसलमान अपने राजनीतिक अधिकारों को प्रभावी बना सकते हैं
इसके अलावा, वक्त की माँग यह भी है कि एक स्थायी और जमीनी स्तर पर जुड़ी हुई क़यादत (नेतृत्व) तैयार की जाए। चुनावी मौसम में उभरने वाले अस्थायी चेहरे, कौम की लंबे समय तक नुमाइंदगी नहीं कर सकते।
अंततः यही कहा जा सकता है कि अगर मुस्लिम समाज ने अपने अंदर राजनीतिक समझ, संगठन और स्थिरता को विकसित कर लिया, तो वो दिन दूर नहीं जब उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी सिर्फ़ सांकेतिक नहीं बल्कि निर्णायक होगी

लेखक:अकील खान ब्यावली , जलगांव 

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