ज्ञापन में बताया गया कि महाराष्ट्र शासन ने 20 मार्च 1978 को ‘छप्परबंद (मुस्लिम धर्मियों सहित)’ समाज को विमुक्त जाति की सूची में शामिल किया था।
इसके बावजूद मुस्लिम समाज के पुराने दस्तावेजों में जाति का उल्लेख नहीं होने के कारण समाज के अनेक लोगों को जाति प्रमाणपत्र एवं जाति वैधता प्रमाणपत्र प्राप्त करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
समाज के प्रतिनिधियों ने बताया कि इस संबंध में भारतीय छप्परबंद मुस्लिम समाज सुधारक मंडल द्वारा औरंगाबाद खंडपीठ में रिट याचिका दायर की गई थी।
न्यायालय के निर्देशों के बाद जाति प्रमाणपत्र सत्यापन समिति ने ऐतिहासिक दस्तावेजों और संदर्भ ग्रंथों का अध्ययन कर 8 अप्रैल 1994 के आदेश में स्पष्ट किया था कि जिन मुस्लिम व्यक्तियों के नाम के साथ ‘शाह’ अथवा ‘फकीर’ शब्द जुड़ा है, उन्हें छप्परबंद समाज का माना जाए।
ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया गया कि राज्य शासन ने वर्ष 1991, 1999, 2002, 2007 तथा 2011 में विभिन्न आदेश जारी कर समाज के दावे को मान्यता दी थी।
हालांकि 16 फरवरी 2015 को जारी आदेश के बाद पूर्व की कुछ महत्वपूर्ण व्यवस्थाएं समाप्त हो गईं, जिससे विद्यार्थियों को शैक्षणिक सुविधाएं, रोजगार में आरक्षण तथा अन्य शासकीय लाभ प्राप्त करने में कठिनाइयां उत्पन्न हो रही हैं।
समाज के पदाधिकारियों ने 23 मार्च 2011 के आदेश को पुनः लागू करने अथवा समाज के हित में उचित निर्णय लेकर शासन स्तर पर न्याय दिलाने की मांग की।
इस अवसर पर समाज सुधारक मंडल के राष्ट्रीय अध्यक्ष अल्हाज अजमल शाह, मीडिया प्रमुख एजाज़ गुलाब शाह, जिलाध्यक्ष गुलाम मोईन शाह, महानगर अध्यक्ष राजू शाह सहित समाज के अनेक पदाधिकारी और कार्यकर्ता उपस्थित थे।

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